एलर्जी को समझने के लिये, प्रतिरक्षा विज्ञान (इम्यूनोलॉजी) को जानना जरूरी है, जिसमें सभी प्रतिरक्षा तंत्रों का अध्ययन किया जाता है। ये तंत्र अनेक हैं और अत्यंत जटिल हैं। अतः अभी तक इस संबंध में बहुत अच्छी जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है। प्रतिरक्षा प्रणाली के कई घटक आमतौर पर प्रकृति में सेलुलर होते हैं और किसी विशिष्ट अंग से जुड़े नहीं होते हैं; बल्कि पूरे शरीर में स्थित विभिन्न ऊतकों में एम्बेडेड या परिसंचारी होते हैं।
अलग-अलग व्यक्तियों में बिल्कुल भिन्न प्रकार से ये तंत्र कार्य करते हैं। एंटीजन और एंटीबॉडी रियेक्शन सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अक्सर कोई बाहर से आया रसायन, जैसे भोजन या कीटाणु की प्रोटीन, एंटीजन होती है, जिसे शत्रु समझकर प्रतिरक्षा तंत्र लड़ने के लिये एंटीबॉडी की फौज खड़ी करता है। यह प्रक्रिया शरीर के बचाव के लिये है।
लेकिन कभी प्रतिरक्षा तंत्र किसी छोटे से शत्रु को बड़ा आतंकवादी मानकर भयंकर हमला कर देता है। बचाव की इस अतिशय कोशिश में अपने ही नागरिक ज्यादा मारे जाते हैं। ऐसा समझिये कि मच्छर या मक्खी मारने के लिये कोई परमाणु बम फोड़ दे। खुद का ही अधिक नुकसान हो जायेगा। इस तरह की इम्यूनोलॉजिकल दुर्घटना हाईपरसेंसिटिविटी, या सामान्य भाषा में कहें तो एलर्जी के रूप में प्रगट होती है।
कभी-कभी भूलवश प्रतिरक्षा तंत्र अपने ही शरीर के किसी पदार्थ को दुश्मन मानकर उससे युद्ध करने के लिए एंटीबॉडी की सेना भेज देता है। तब आंतरिक हाईपरसेंसिटिविटी से आटो-इम्यून रोग पैदा होते हैं।
किसी व्यक्ति में ऐसा क्यों होता है? सबमें क्यों नहीं होता?
आनुवांशिक गुणों की भूमिका नजर आती है फिर भी यह प्रश्न काफी हद तक अनुत्तरित है। इसी वजह से एलर्जी का सटीक इलाज एक सीमा तक ही हो पाता है। आशा है कि इस दिशा में चल रहे नये अनुसंधान भविष्य में अवश्य रोशनी करेंगे। रूसी जीवविज्ञानी इल्या इलिच मेखनिकोव ने प्रतिरक्षा विज्ञान पर अध्ययन को बढ़ाया और उन्हें इस कार्य के लिए 1908 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। चिकित्सा विज्ञान की यह शाखा अभी नवजात शिशु ही है।


