Wednesday, 6 March 2019

क्यों कुछ लोगों को किसी चीज़ से एलर्जी होती है जबकि कुछ को नहीं?



एलर्जी को समझने के लिये, प्रतिरक्षा विज्ञान (इम्यूनोलॉजी) को जानना जरूरी है, जिसमें सभी प्रतिरक्षा तंत्रों का अध्ययन किया जाता है। ये तंत्र अनेक हैं और अत्यंत जटिल हैं। अतः अभी तक इस संबंध में बहुत अच्छी जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है। प्रतिरक्षा प्रणाली के कई घटक आमतौर पर प्रकृति में सेलुलर होते हैं और किसी विशिष्ट अंग से जुड़े नहीं होते हैं; बल्कि पूरे शरीर में स्थित विभिन्न ऊतकों में एम्बेडेड या परिसंचारी होते हैं।
अलग-अलग व्यक्तियों में बिल्कुल भिन्न प्रकार से ये तंत्र कार्य करते हैं। एंटीजन और एंटीबॉडी रियेक्शन सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अक्सर कोई बाहर से आया रसायन, जैसे भोजन या कीटाणु की प्रोटीन, एंटीजन होती है, जिसे शत्रु समझकर प्रतिरक्षा तंत्र लड़ने के लिये एंटीबॉडी की फौज खड़ी करता है। यह प्रक्रिया शरीर के बचाव के लिये है।
लेकिन कभी प्रतिरक्षा तंत्र किसी छोटे से शत्रु को बड़ा आतंकवादी मानकर भयंकर हमला कर देता है। बचाव की इस अतिशय कोशिश में अपने ही नागरिक ज्यादा मारे जाते हैं। ऐसा समझिये कि मच्छर या मक्खी मारने के लिये कोई परमाणु बम फोड़ दे। खुद का ही अधिक नुकसान हो जायेगा। इस तरह की इम्यूनोलॉजिकल दुर्घटना हाईपरसेंसिटिविटी, या सामान्य भाषा में कहें तो एलर्जी के रूप में प्रगट होती है।
कभी-कभी भूलवश प्रतिरक्षा तंत्र अपने ही शरीर के किसी पदार्थ को दुश्मन मानकर उससे युद्ध करने के लिए एंटीबॉडी की सेना भेज देता है। तब आंतरिक हाईपरसेंसिटिविटी से आटो-इम्यून रोग पैदा होते हैं।
किसी व्यक्ति में ऐसा क्यों होता है? सबमें क्यों नहीं होता?
आनुवांशिक गुणों की भूमिका नजर आती है फिर भी यह प्रश्न काफी हद तक अनुत्तरित है। इसी वजह से एलर्जी का सटीक इलाज एक सीमा तक ही हो पाता है। आशा है कि इस दिशा में चल रहे नये अनुसंधान भविष्य में अवश्य रोशनी करेंगे। रूसी जीवविज्ञानी इल्या इलिच मेखनिकोव ने प्रतिरक्षा विज्ञान पर अध्ययन को बढ़ाया और उन्हें इस कार्य के लिए 1908 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। चिकित्सा विज्ञान की यह शाखा अभी नवजात शिशु ही है।

पक्षियों को बिजली के तार पर बैठने पर करंट क्यों नहीं लगता है?

पक्षियों को बिजली के तार पर बैठने से करंट नहीं लगता है, इसे समझने के लिए आइये पहले विद्युत् प्रवाह को समझते है |
विद्युत् का प्रवाह चालक के अंदर, इलेक्ट्रॉन्स के एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानांतरण के कारण होता है जिसका अर्थ है कि जब इलेक्ट्रॉन्स, चालक के अंदर, एक स्थान से दूसरे स्थान की और गति करते हैं तो इससे विद्युत् का प्रवाह होता है|
बिजली के तार कॉपर(ताँबे) के बने होते हैं, जो कि (ताँबा)विद्युत् का सबसे अच्छा चालक होता है| अच्छा चालक होने का अर्थ है जो विद्युत् के प्रवाह में कम से कम प्रतिरोध उत्पन्न करे | चूँकि ताँबे का तार विद्युत् के प्रवाह में कम प्रतिरोध उत्पन्न करता है,इसलिए बिजली को अपने अंदर आसानी से बहने में मदद करता है |
विद्युत् के प्रवाह का नियम है कि यदि विद्युत् प्रवाह होने के दो पथ उपलब्ध हैं, तो विद्युत् का प्रवाह कम प्रतिरोध वाले पथ से होकर गुजरेगा, और बस यही नियम पक्षियों को अपनी जान को नुकसान पहुँचाये बिना तारों पर बैठे रहने में मदद करता है|
देखिये जब पक्षी तारों पर बैठते हैं उस समय विद्युत् के प्रवाह के लिए दो पथ तैयार रहते हैं एक कॉपर(ताँबे) का तार जिससे विद्युत् पहले से ही प्रवाहित रही है तथा दूसरा पक्षी का शरीर, चूँकि पक्षी के शरीर की कोशिकाये एवं ऊतक, ताँबे की तार की तुलना में ज्यादा प्रतिरोध उत्पन्न करते हैं तो विद्युत् का प्रवाह ताँबे के तार से ही बना रहता है |
दूसरा एक और बड़ा कारण है कि विद्युत् का प्रवाह अधिक वोल्टेज(विद्युत् दाब) वाले क्षेत्र से कम वोल्टेज(विद्युत् दाब) वाले क्षेत्र की और होता है जिसका अर्थ है कि वोल्टेज में अंतर| चूँकि पक्षी का पूरा शरीर एक ही तार पर होता है जिससे की वोल्टेज में कोई अंतर मौजूद नहीं होता है और इसके कारण विद्युत् का प्रवाह उनके शरीर से नहीं होता है|
यदि वही पक्षी अपने एक पैर को एक तार पर तथा दूसरे पैर को दूसरे तार पर या जमीं पर रख दे तो तुरंत वोल्टेज में अंतर पैदा हो जायेगा और विद्युत् धारा अधिक वोल्टेज क्षेत्र( विद्युत् के एक तार) से कम वोल्टेज क्षेत्र (विद्युत् के दूसरे तार या धरती(शुन्य विद्युत् क्षेत्र)) की और बहना शुरू हो जाएगी और पक्षी करंट लगने की वजह से अपनी जान गवां बैठेगा |

यदि एक व्यक्ति छत के किनारे पर बैठा हो और हवा चल रही हो तो क्या हवा उस व्यक्ति को गिरा सकती? यदि हां तो हवा की गति कितनी होनी चाहिए अौर क्या शहरों मे ऐसी तेज हवाओं का चलना संभव है?

ये हम सब जानते हैंं कि हवा हमें छत के किनारे पर बैठे होने पर गिरा सकती है। लेकिन कितनी तेज हवा हमें गिरा सकती है?


देखिये ये कई बातों पर निर्भर करता है जैसे कि व्यक्ति का भार कितना है, उसके बैठने का अंदाज, वह कितना मोटा या पतला है। इसलिए प्रश्न की ऐसी गणना करना जो सभी के लिए लागू हो सम्भव नही। इसलिए मैं कुछ चीजें मान लेता हूँ जो किसी औसत इंसान जो किनारे पर बैठा होगा उसके लिए लागू होंगी। जैसे कि -
  • हम ये नहींं मानते कि व्यक्ति का भार कितना है लेकिन ये मानते हैंं कि किसी व्यक्ति पर अगर 20 किलो का द्रव्यमान साइड से लगाया जाता है तो वह आराम से गिर जाएगा।
  • हम मानते हैंं कि व्यक्ति बिल्कुल सीधा बैठा है। जिससे हवा सीधे उसके शरीर को लगती है। हवा के संपर्क में आने वाले शरीर का क्षेत्रफल 0.5 m^2 है।
इस तरह हवा द्वारा शरीर पर लगाया गया बल -
F=12ρV2A
mg=12ρV2A
यहाँ, m = 20 किलोग्राम
गुरुत्व नियतांक g = 9.81 m/s^2
हवा का घनत्व ρ = 1.2 kg/m^3
हवा की गति V = ?
हवा के सम्पर्क का क्षेत्र = 0.5 m^2
इसीलिए,
20×9.81=12×1.2×V2×0.5
V2=20×9.81×21.2×0.5
V = 25.52 मीटर प्रति सेकंड
इसका अर्थ है, अगर आप बिना किसी सहारे छत की किनारी पर बैठे हो तो 25 मीटर प्रति सेकंड की हवा आपको गिरा सकती है। यह शहरों में भी सम्भव है।
इसका ज्यादा सटीक जवाब  सिमुलेशन के द्वारा निकाल कर जोड़ जाये तो बेहतर होगा ..

रेफ्रीजिरेटर का बर्फ बाजार से लाये बर्फ की तुलना में जल्दी पिघल जाता हैं, क्यों

ये एक बहुत अच्छा प्रश्न है और कमाल की बात है आपने ये नोटिस भी किया।
ज्यादातर लोगों को ये बात बिल्कुल नयी लगी होगी कि हमारे रेफ्रिजरेटर की बर्फ, बाजार की बर्फ से जल्दी पिघल सकती है।
क्या ऐसा होता है, यदि हां तो इसका क्या कारण है ?
जी हां!! ऐसा भी होता है कि दो समान आकार के बर्फ के ब्लॉक (अलग तरीके से जमाये गए) एक ही वातावरण की उपस्थिति में अलग अलग समय पर पिघलते है। लेकिन ऐसा नही है कि घर के रेफ्रिजरेटर की बर्फ हमेसा ही बाजार की फैक्ट्री वाली बर्फ से पहले पिघलती हो। इसका ठीक उल्टा भी हो सकता है।
यदि आपके साथ ऐसा हमेसा ही होता है तो इसका मुख्य कारण हो सकता है कि आप बोरिंग का पानी (कठोर जल) सीधे ही बर्फ जमाने में उपयोग करते है। जिससे जो बर्फ जमती है वो कुछ इस तरह की दिखती होगी -

जबकि जो बर्फ आप बाजार से लाये होंगे वो कुछ ऐसी दिखती होगी -

दोनों में अंतर आप आसानी से देख सकते है कि एक कुछ सफेद जबकि दूसरी बिल्कुल साफ़ है।
इसका कारण है, यदि हम कठोर जल को बिना साफ किये बर्फ बनाते है तो उसमें घुली हुई अशुद्धियां जैसे कैल्शियम और हवा एक साथ एकत्रित हो जाते है। जबकि फैक्ट्री वाली बर्फ में मांग रहती है कि बर्फ बिल्कुल साफ होनी चाहिए इसलिए वहां पानी को साफ करने के लिए केमिकल्स का उपयोग किया जाता है।
चूंकि सफेद बर्फ में मिली अशुद्धि और हवा के कारण उसका डीयू पॉइंट (Dew Point) कम हो जाता है इसलिए वह जल्दी पिघलती है। आप कभी पानी को उबालकर बर्फ जमाना तब वह भी बिल्कुल साफ बनेगी।
फुटनोट

पानी का घनत्व 4℃ पर ही सबसे ज़्यादा क्यों होता है? तापमान कम होने पर घनत्व क्यों नही बढ़ता?

ये पानी की विशेषता है कि उसका अधिकतम घनत्व 4 डिग्री सेंटीग्रेड पर मिलता है। ऐसा पानी के मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर के कारण होता है। इसे समझने से पहले जिन्हें नही पता उनके लिए थोड़ा सा बेसिक समझ लेते है। जिन्हें नही पता घनत्व क्या होता है तो यह किसी भी पदार्थ के द्रव्यमान और उसके आयतन का अनुपात है। कम घनत्व वाले पदार्थ ज्यादा घनत्व वाले पदार्थ के ऊपर तैरते है क्योंकि वह उनसे हल्के होते है।
अब जरा नीचे दिए चित्र को देखिये -

इस चित्र में आप देख सकते है कि गर्म पानी, ठन्डे पानी से कम घनत्व का होने के कारण ऊपर तैरता है। ऐसा सभी पदार्थो के साथ होता है क्योकि गर्मी के साथ मोलेक्युल्स दूर जाने लगते है जिससे वह पदार्थ हल्का हो जाता है। साथ ही ठंड के साथ मॉलिक्यूल पास आते है और घनत्व बढ़ जाता है।
लेकिन पानी के साथ हमे एक बहुत अजीब पैटर्न देखने को मिलता है। ठंडा पानी, गर्म पानी से तो ज्यादा भारी होता है लेकिन उसे और ठंडा करने पर (बर्फ) वह गर्म पानी पर तैरने लगता है। ऐसा इसलिए होता है क्योकि तापमान ठीक ४ डिग्री से कम करने पर पानी का घनत्व अचानक से घटता है।

ये पानी की एक बहुत जरूरी विशेषता है। यदि ऐसा नहीं होता तो समुद्र में बर्फ नीचे से जमना शुरू करती और सारे जीव मरने लगते।
पानी का ये अजीब ब्यवहार उसके मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर के कारण होता है और इसे आप आसानी से समझ सकते है। हमे बस ध्यान देना की बर्फ का मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर कैसा होता है। इसे आप नीचे चित्र में देख सकते है

जैसा की आप देख सकते बर्फ के स्ट्रक्चर में मोलेक्युल्स के बीच बहुत सारा खाली स्पेस होता है। जब मॉलिक्यूल इतनी दूरी पर सेट होंगे जो जाहिर सी बात है। इससे बर्फ भी हल्की होगी। अब जब हम बर्फ को गर्म करना शुरू करते है तो इससे मोलेक्यूलर स्ट्रक्चर टूट जाता है। हम जानते है पानी के मॉलिक्यूल एक दूसरे की तरफ आकर्षित होते है इसलिए जैसे ही मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर टूटता है। सारे मोलेक्यूल एक दूसरे के पास आने लगते है। जब मॉलिक्यूल पास पास होंगे तो इससे पानी का घनत्व भी बढ़ेगा क्योकि उसका द्रवमान तो समान है लेकिन आयतन कम हो गया।
लेकिन ये मॉलिक्यूल कुछ देर तक ही साथ रह पाते है क्योकि जैसे - जैसे तापमान बढ़ता जाता है उनकी गतिज ऊर्जा भी बढ़ती जाती है। जब तापमान ४ डिग्री पार करता है तो मोलेक्युल्स में इतनी गतिज ऊर्जा हो जाती है की उन्हें आकर्षण बल उन्हें रोक नहीं पाता, जिससे मोलेक्युल्स दूर जाने लगते है। इससे उनका घनत्व कम होने लगेगा क्योकि आयतन बढ़ गया है।
मुझे उम्मीद है आपको समझ आया होगा। यह उष्मागतिकी (Thermodynamics) के पियूर सस्टेन्ट्स विषय का हिस्सा है




Awesome Particle Physics Facts In Hindi

इंसानी दिमाग अपनी बुद्धि के जरिए बहुत कुछ खोज कर निकाल सकता है। प्राचीन काल से ले कर आज तक वह अपने बुद्धि-कौशल के जरिए तरह-तरह के अत्याधुन...